रॉयल कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स की अध्येतावृत्ति

यूनाइटेड किंगडम और आयरलैंड के गणराज्य में शल्यचिकित्सक के रूप में काम करने के लिए फैलोशिप ऑफ़ दी रॉयल कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स (FRCS) एक व्यावस है। यह फैलोशिप रॉयल कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स ऑफ इंग्लैंड, रॉयल कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स इन आयरलैंड (चार्टर्ड 1784), रॉयल कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग (चार्टर्ड 1505) और रॉयल कॉलेज ऑफ फ़िज़िशिएन्स एंड सर्जन्स ऑफ ग्लासगो के द्वारा प्रदान की जाती है, हालांकि शुद्ध रूप से देखा जाये तो इसके प्रथमाक्षर लंदन कॉलेज से संबंधित हैं। कई राष्ट्रमंडल देशों में भी समान योग्यता की आवश्यकता होती है, जैसे कनाडा में FRCSC, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में FRACS और दक्षिण अफ्रीका में FCS(SA).

मूल फैलोशिप, सामान्य शल्यचिकित्सा और कुछ विशिष्ट शल्यचिकित्साओं में उपलब्ध थी - जैसे कि नेत्र या ईएनटी शल्यचिकित्सा, या प्रसूति एवं स्त्री रोग में - जिनका प्रथमाक्षरों में कोई संकेत नहीं मिलता था। इसका उपयोग प्रशिक्षण के बीच में करना शुरू किया गया।

आज अनेक प्रकार की उच्च फैलोशिप मौजूद हैं, जिन्हें उच्च स्तरीय विशेषज्ञ प्रशिक्षण के अंत में अक्सर कुछ सीमित क्षेत्रों में ही प्रदान किया जाता है; इनमें से सबसे पहली थी ऑर्थोपेडिक्स (विकलांग-विज्ञान) में FRCS (orth). अन्य फैलोशिप में शामिल हैं, मूत्रविज्ञान में FRCS (Urol) और मैक्सिलोफैशियल शल्यचिकित्सा में फैलोशिप FRCS (OMFS).

रॉयल कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स की मेम्बरशिप

भ्रम से बचने के लिए, मूल फेलोशिप का नाम बदलकर मेम्बरशिप MRCS या एसोसिएट फैलोशिप (AFRCS) कर दिया गया था। दुर्भाग्यवश इसकी वजह से एक नया भ्रम पैदा हो गया, क्योंकि रॉयल कालेजों द्वारा मेडिसिन में अर्हता परीक्षाएं भी ली जाती थीं, जिसके बाद ज़्यादातर कॉलेज लाइसेंधरी डिप्लोमा (LRCP, LRCS, आदि) प्रदान करते थे। हालांकि रॉयल कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स ऑफ इंग्लैंड, इस स्तर की अपनी मेंबरशिप को रॉयल कॉलेज ऑफ़ फ़िज़िशिएन्स के लाइसेंसधारियों के साथ प्रदान करता था।

मिस्टर या डॉक्टर?

FRCS (और नयी, लेकिन पुरानी नहीं, सदस्यता - MRCS) के धारक अक्सर "डॉक्टर" के अपने शीर्षक को त्याग कर, "श्री", "श्रीमती" या "सुश्री" का प्रयोग करते हैं। ऐसा पिछले समय से चला आ रहा है जब शल्यचिकित्सक चिकित्सा विद्यालयों में नहीं जाते थे और केवल कुशल कारीगर (ट्रेड्समैन) के रूप में अंगोंच्छेदन या फिर मूत्राशय से पत्थरों को निकालने का कार्य करते थे और शिक्षुता (एप्रेंटिसशिप) के माध्यम से अपने कौशल को सीखते थे। ध्यान दें कि 1540 में हेनरी VIII द्वारा युनाइटेड बार्बर सर्जन्स कंपनी नामक एक व्यापारी संघ का गठन किया गया था क्योंकि कई लोग दोनों का अभ्यास किया करते थे। 1745 में, जॉर्ज द्वितीय द्वारा औपचारिक रूप से शल्य चिकित्सकों को नाइयों से अलग कर दिया गया।

हिप्पोक्रेटिक ओथ का एक अनुभाग इसका एक वैकल्पिक विवरण है जिसके अनुसार "मैं अपनी क्षमता और विवेक के अनुसार अपने रोगियों के लिए उपचार निर्धारित करूँगा और कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा,"- शल्यचिकित्सा की स्वाभाविक प्रकृति द्वारा रोगियों को नुकसान पहुँचता है, इसलिए शल्यचिकित्सक को "डॉक्टर" की उपाधि देने के लायक नहीं माना जाता था। यह भी एक प्राचीन चलन है, जो आज तक चला आ रहा है हालांकि इसकी कोई वास्तविक बुनियाद नहीं है।

"कोई नुकसान न करना", चिकित्सकों द्वारा नुस्खा लिखने पर भी उतना ही लागू होता है जितना शल्य चिकित्सा पर. इसके अलावा, हिप्पोक्रेट्स का अनुसरण करने वाले कई यूनानी चिकित्सक शल्यचिकित्सा भी करते थे और नुस्खे भी लिखते थे।
इसके अतिरिक्त, शीर्षक का यह परिवर्तन यूनाइटेड किंगडम तक ही सीमित है और अन्य देशों में हिप्पोक्रेटिक ओथ के व्यापक इस्तेमाल के बावजूद इसका चलन नहीं है।

यहाँ यह भी याद करना प्रासंगिक है कि नाईटहुड रैंक के नीचे के वे सभी पुरुष जो स्वयं के लिए एस्क्वायर का उपयोग नहीं कर सकते थे, उनके लिए शिष्टाचार स्वरूप श्री के शीर्षक का उपयोग एक अपेक्षाकृत नया चलन है और वर्तमान की अपेक्षा अतीत में इसको अधिक प्रतिष्ठासूचक माना जाता था।

न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया और दक्षिण अफ्रीका में शल्यचिकित्सकों द्वारा पुनः "श्री" (आदि) शीर्षक की ओर लौटने का चलन काफी आम है। ब्रिटेन और आयरलैंड में, गैर-शल्य चिकित्सा क्षेत्रों में कदम रखने वाले FRCS उपाधि-धारकों द्वारा पुनः "डॉ" का इस्तेमाल किये जाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। स्कॉटलैंड में, केवल कुछ शल्यचिकित्सक ही "श्री" की ओर वापस लौटते हैं: एडिनबर्ग में नेत्र रोग विशेषज्ञ, ईएनटी शल्यचिकित्सक और प्रसूति एवं स्त्रीरोग विशेषज्ञ "डॉ" ही रहते हैं, लेकिन अन्य शहरों में उपयोग काफी हद तक इंग्लैंड के ही समान है।

फेलोज

रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ इंग्लैंड (एफआरसीएस) के मूल ३०० फेलोज

  • जॉन एबर्नेथी (सर्जन) (1764-1831)
  • जॉन बेडली (सर्जन) (1783-1870)
  • डैनियल वेट (सर्जन) (1791-1888)
  • लेडी सांड्रा ए. मिशी (सर्जन जनरल) (1987-वर्तमान तक)

इन्हें भी देखें

  • रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स की सदस्यता
  • अमेरिकन कॉलेज ऑफ सर्जन्स के फेलो
  • डेंटल सर्जरी एफडीएसआरसीएस इंग्लैंड की फेलोशिप
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